Saturday, 12 January 2019

सर्दियों में तिल व तिल के तेल के औषधीय प्रयोग एवम् उपाय

Til
तिल


सर्दियों में तिल व तिल के तेल के प्रयोग एवम् औषधीय उपाय (uses sesame and sesame oil )


तिल से प्रतेक व्यक्ति परिचित है । सर्दियों में लोग इसके व्यंजन बनाकर बहुत ही चाव से खाते हैं । मकर संक्रांति के समय तिल का विशेष महत्व है, इस समय तिल के लड्डू आदि  बना कर खाए जाते हैं । रंगो के अनुसार तिल काले, सफेद व लाल रंग के होते हैं । औषधीय रूप में काले तिल का तेल अति उत्तम माना जाता है । तिल का सेवन करने से जठर अग्नि तीव्र होती है, बुद्धि तीव्र होती है व मेधा शक्ति बढ़ती है । तिल का प्रयोग दांतों के रोग में भी प्रयोग किया जाता है । तिल का तेल त्वचा के लिए बहुत ही लाभ दायक है ।

तिल के तेल से लगातार मालिश करने से रक्त विकार व वात रोग दूर होते हैं । घाव में तिल की पुल्टिस बनाकर प्रयोग किया जाता है । शरीर के किसी भाग में कांटा लग जाए तो तिल के तेल की लगातार मालिश करने से कांटा बाहर निकाल जाता है । ऐसे अनेक रोगी में तिल का उपयोग किया जाता है । तिल की तासीर गर्म होती है, इस लिए इसका सेवन अधिक तर जाड़ों में किया जाता है । लेकिन तिल के तेल का उपयोग भोजन में वर्जित बताया गया है । तिल के तेल का औशधीय प्रयोग चिकित्सक के परामर्श से किया जा सकता है ।


तिल
तिल


तिल को भारत में अनेक नामों से जाना जाता  है। इसका अंग्रजी नाम है, इसे तिल, ऐलू, येल्लू, खासू, रासी, तल, नुवल्लू, तिलगाछ आदि नामों से जाना जाता है । तिल के बीज में वसा, कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, mucilage, कैलशियम, मैग्नीशियम, खनिज, तथा विटामिन ए, बी, सी, तथा ई पाए जाते हैं । तिल के पत्ते में गोंद जैसा एक पदार्थ होता है । तिल के फूल में glycolipids, तथा फास्फोलीपिड पाए जाते हैं ।
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तिल के औषधीय उपयोग


1. सिर के रोग में तिल के उपयोग


  • तिल के पत्ते व इसकी जड़ का क्वाथ बनाकर सिर धोने से व काले तिलों का तेल सिर पर लगाने से बाल मुलायम घने व काले रहते हैं, बाल समय से पहले सफेद नहीं होते हैं ।

  • बालों में रूसी होने पर तिल के फूल व गोक्षुर को समान मात्रा में मिलाकर, इसे घी तथा मधु के साथ पीस कर सिर पर लगाने से रूसी व गंजापन दूर हो जाता है ।

  • तिल के पत्तों को सिरके या जल में पीस कर माथे पर लगाने से सिर दर्द में आराम मिल जाता है ।

2. पेट के रोग में तिल के उपयोग


  • तिल के 5 ग्राम चूर्ण में स्नान मतरा में मिश्री व बकरी का दूध छ: गुना मिलाकर सेवन करने से रक्त अतिसार में लाभ होता है ।

  • तिल के पत्तों को पानी में भिगो दें, पानी में भिगोने से पानी में लुआब आ जाता है । ये लुआब बच्चो को लगाने से आम अतिसार, जुकाम व मूत्र रोग में फायदा होता है ।

3. आंखों के रोग में तिल के लाभ (benefit of til )


  • तिल के फूलों पर सर्दियों में पड़ी हुई ओस की बूंदों को किसी तरीके से उठा कर शीशी में रख लें, इस ओस को आंखों में डालते रहने सेआंखों के रोग में फायदा होता है ।

  • काले तिल को उबाल कर इसका क्वाथ बनाकर आंखो को धोने से नेत्र रोग दूर होते हैं ।


4. तिल के फायदे प्रजनन संबंधी रोग में


  • गर्भाशय में जमें हुए रुधिर को  बिखेरने के लिए 600 ग्राम तिल के चूर्ण को दिन में 3 बार सेवन करने एवम् उष्ण जल के टब में बैठने से फायदा होता है ।

  • तिल का  क्वाथ बनाकर इसकी 100 ग्राम मात्रा में 2 ग्राम सौंठ व 2 ग्राम कालीमिर्च तथा 2 ग्राम पीपली का चूर्ण मिलाकर 3 बार पीने से मासिक धर्म की रुकावट मिट जाती है ।

  • 1 से 2 ग्राम तिल के चूर्ण को 3 से 4 बार पानी के साथ लेने से मासिक धर्म नियमित होता है । इसके अलावा तिल का काड़ा बनाकर इस काडे की 30 से40 ग्राम मात्रा पीने से भी मासिक धर्म नियमित होता  है ।



Til
सफेद तिल


5. पथरी में तिल के फायदे (benefit of sesame)


  • तिल की कोपल को छाया में सूखी हुई हों, की 125 से 250 ग्राम प्रतिदिन खाने से पथरी गल कर बाहर हो जाती है ।

  • तिल के फूलों के छार में 2 चम्मच शहद व 250 ग्राम दूध मिलाकर पी लेने से पटरी गल कर निकाल जाती है ।

6. विष का उपचार



  • तिल को पानी में पीस का लेप करने से बिल्ली का काटा विष दूर हो जाता है । तिल एवम् हल्दी को पानी में पीस कर लेप करने से भी विष दूर हो जाता है । तिल को सिरके में पीस कर मलने से ततैए का विष हट जाता है ।

  • तिल व हल्दी को पानी में पीस कर लेप लगाने से मकड़ी का विष दूर हो जाता है ।

  • तिल की लुगदी बनाकर उसे घी के साथ लेने से विषम ज्वर में लाभ होता है


ऊपर बताए फायदों के अलावा तिल का प्रयोग अनेक रोगों में किया जाता है । रात के समय जो बच्चे बिस्तर गीला कर देते हैं उन्हें लंबे समय तक Til का सेवन करना चाहिए अवश्य लाभ होगा । इसके अलावा सर्दियों में तिल व तिल के तेल का प्रयोग करना चाहिए, तिल पोषण से भरपूर होता है  इसका सेवन करते रहना चाहिए, तिल के तेल का सेवन केवल औषधीय प्रयोग में चिकित्सक के परामर्श पर ही करें, इस लेख का मूल उद्देश्य लोगों को अर्यव्ड के प्रति जागरूक करना है ।






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Sunday, 30 December 2018

मासपेशियों में तनाव व दर्द दूर करने के देसी प्राकृतिक उपाय

मासपेशियों में तनाव व दर्द दूर करने के देसी प्राकृतिक उपाय- muscles pain in hindi



इस लेख में मासपेशियों के दर्द व तनाव दूर करने के देसी प्राकृतिक उपाय के बारे में बता रहें हैं । व्यक्ति के शरीर में जब दर्द की शिकायत होती है तो वह दर्द से तुरंत राहत पाने के लिए बाजार में उपलब्ध एलोपैथिक दवाओं का सहारा लेता है । इन दवाओं से तुरंत राहत तो मिल जाती है लेकिन  पूर्ण रूप से लाभ नहीं मिल पाता है । मासपेशियों में तनाव चोट, चिंता, दुर्घटना अथवा किसी बीमारी के कारण हो सकता है । जानकारों के अनुसार कभी कभी शरीर को अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है । 

इस ऑक्सीजन की पूर्ति के लिए मासपेशियों में एक क्रिया होती है, जिससे शरीर में लैक्टिक एसिड एकत्र हो जाता है, कारण स्वरूप शरीर की मासपेशियों में तनाव व दर्द होने लगता है, जब लैक्टिक एसिड बिखर जाता है तो तनाव व दर्द दूर हो जाता है । लेकिन इस प्रयोग में समय अधिक लगता है ।


                                      
maspeshi me dard
Muscles Pain


मांसपेशियों में दर्द दूर करने के घरेलू नुस्खे - muscles pain home remedies



चिकित्सकों का मानना है कि मासपेशियों में तनाव दर्द दूर करने के लिए जहां तक संभव हो मालिश आदि व प्राकृतिक घरेलू नुस्खों का प्रयोग किया जाय तो उत्तम होगा । इसके अनेक घरेलू प्राकृतिक उपाय नीचे बताए जा रहे हैं ।

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1. मासपेशियों के तनाव व दर्द में उपयोगी है तेल मालिश - muscles pain in hindi




मालिश करने से मासपेशियों में रक्त परिसंचरण अच्छा होता है व मासपेशियों को गर्मी मिलती है  । इससे शरीर में लैक्टिक एसिड कम होकर दर्द में राहत मिलती है । मालिश करने के लिए सरसों का तेल और अदरक व पिपरमेंट का तेल अच्छा माना जाता है, यह दर्द दूर करने में सहायक है ।



2. सिकाई द्वारा मासपेशियों के तनाव एवम् दर्द का इलाज- muscles pain in hindi




इसे हीट थैरेपी कहा जाता है ।  इसका प्रयोग मासपेशियों में जकड़न व ऐठन में किया जाता है । चिकित्सकों का मानना है कि प्रभावित स्थान पर सिकाई करने से रक्त संचरण अच्छा होता है व मासपेशियों के खीचाव व दर्द में आराम मिलता है । चोट लगी मासपेशियों पर सिकाई करने  दर्द में आराम मिलता है ।



3. नमक के पानी से स्नान से मांसपेशियों का तनाव व दर्द दूर होता है - muscles pain in hindi




पानी में नमक मिलाकर स्नान करने से शरीर की सूजन काम हो कर दर्द में आराम मिलता है । इस प्रयोग को करने के लिए अपने जरूरत के अनुसार टब लेकर उसे नहाने लायक गरम पानी से भरे, इसमें एक कप नमक मिलाकर इस पानी में 20 से 25 मिनट तक बैठ जाए व इसी पानी से स्नान करें, इस प्रयोग से मासपेशियों के दर्द व तनाव में आराम मिलता है व ऐठन दूर हो जाती है ।



4. मासपेशियों पर बर्फ की सिकाई से मांसपेशियों के ऐठन व दर्द दूर होती है - muscles pain in hindi 




मासपेशियों का तनाव अथवा खीचाव दूर करने का ये उत्तम प्रयोग है । जहा पर चोट लगी हो उस स्थान पर बर्फ की सिकाई करते हैं । इस प्रक्रिया को कोल्ड थेरैपी या क्रियो थेरैपी कहते हैं । इसका प्रयोग भाग दौड़ या खेल कूद में लगी चोट को राहत पहुंचाने के लिए किया जाता है ।

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5. गरम व ठंडे पानी से स्नान मासपेशियों के तनाव से राहत दिलाता है 




गरम व ठंडे पानी का स्नान बारी बारी करने से से मासपेशियों के दर्द व तनाव में तुरंत राहत मिलती है । इस प्रयोग से पूरे शरीर को आराम मिलता है । चिकित्सकों का मानना है कि इस विधि से रक्त संचार बहू अच्छा हो जाता है व दर्द में आराम बहुत जल्दी मिलता है ।



6. जड़ी बूटी व हर्बल लेप द्वारा मासपेशियों के खीचाव व दर्द के उपचार --muscles pain in hidi



कुछ जड़ी बूटियों में दर्द निवारक का गुण होता है, इस तरह के लेप बाजार में उपलब्ध होते है, इनको दर्द वाले स्थान पर लगाने से दर्द में आराम मिल जाता है । हर्बल लेप जेल, बाम, अर्क व अर्ध ठोस रूप में मिलते है । ये पदार्थ त्वचा के अंदर जाकर  मासपेशियों के खीचाव में राहत दिलाते है व ऐठन भी नहीं रहती है ।



7. लालमिर्च का पेस्ट उपयोगी है मासपेशियों के तनाव में




ललमिर्च में एक ऐसा तत्व पाया जाता है जो मासपेशियों की जकड़न व दर्द से राहत पहुंचाता है । चिकित्सक दर्द में इस पेस्ट को लगाने की सलाह देते हैं । इस प्रयोग को करने के लिए आधा चम्मच मिर्च को नारियल तेल अथवा जैतून के तेल में मिला कर इस पेस्ट को प्रभावित स्थान पर लगाने से दर्द दूर हो जाता है । यह एक अच्छा प्रयोग है और फायदा भी होता है, लेकिन इस प्रयोग को करने से पूर्व किसी चिकित्सक की सलाह अवश्य ले लें ।



8. शरीर में मैग्नीशियम की पूर्ति से मासपेशियों के दर्द का इलाज-muscles pain in hindi




अन्य तत्वों की तरह मैग्नीशियम भी शरीर के लिए जरूरी तत्व है । शरीर में गाग्निशियम की कमी होने पर मासपेशियों में दर्द व ऐठन होने लगती है । इस लिए मैग्नीशियम की पूर्ति करना आवश्यक है । उन खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाय जिनमें मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता हो । मैग्नीशियम  की प्रचुरता वाले खाद्य पदार्थ हैं , गुड, कद्दू के बीज, अलसी के बीज, सूरज मुखी के बीज, पालक, तिल, बदाम, काजू आदि । इन खाद्य पदार्थो का सेवन करने से मासपेशियों तनाव, खीचाव, ऐठन व दर्द दूर हो जाता है ।








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Thursday, 20 December 2018

अजवाइन के उदर विकारों में प्रयोग व 6 महत्वपूर्ण फायदे एवम् गुण

अजवायन परिचय


इस लेख में आपको अजवाइन के उदर विकारों में प्रयोग व महत्वपूर्ण फायदे एवम् गुण के बारे में बताने जा रहे हैं । अजवाइन  का सेवन औषधि के रूप में हमारे देश में पुराने समय से किया जा रहा है । अजवाईन पाचक औषधि के रूप में प्रसिद्ध है । अजवाईन के प्रयोग से अनाज का पाचन ठीक से होता है, इससे भूख खुल कर लगती है । ऐसा कहा जाता है कि अकेली अजवाईन ही सैकड़ों प्रकार के अन्न को पचाने की छमता रखती है । अगर किसी को दूध न पचता हो तो दूध पीकर ऊपर से थोड़ी सी अजवाईन खाने से दूध का पाचन हो जाता है । अगर अनाज व मिठाई जैसी चीजें न पचती हो तो इसमें अजवाईन का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से पाचन अच्छे से हो जाता है ।

Ajwain
अजवाइन


शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द हो तो अजवान को पानी में पीस कर लेप करें व ऊपर से सिकाई कर दे, दर्द में आराम मिल जायेगा । अजवाईन का प्रयोग बहुत से रोगों में किया जाता है । अजवाइन के महत्वपूर्ण फायदे व गुण हैं, जैसे - जुकाम , खांसी, जलोदर, पेट के कीड़े, उदर विकार, बहुमुत्र आदि रोगी में किया जाता है । अजवायन को अंग्रेजी में Ajowan कहते हैं । इसे अलग अलग राज्यो में अलग अलग नामों से जाना जाता है ।

संस्कृत    : यवानि, अजमोडिका,

हिंदी।     : अजवायन, Ajwain

बंगाली।  :  जोवान

पंजाबी   : जवेन

मराठी    : ओवा

गुजराती :अज्जमो

तेलगु    : वामु

अजवाईन में एक द्रव्य पाया जाता है, जो सुगंधित व उड़न शील होता है, इस लिए इसमें खुशबू आती है, Ajwain से फूल सत निकाला जाता है जिसे अंग्रजी में थायमोल के नाम से जानते हैं । अजवाईन को पानी में भिगोने के बाद वाष्पन विधि से सत निकाला जाता है ।





अजवाईन के औषधीय प्रयोग:



1. अजवाइन का उदर विकार में  प्रयोग 




  • भोजन करने के बाद छाती में जलन होने पर एक ग्राम अजवायन व बादाम की एक गिरी को चबा चबा कर खाएं ।

  • अजवायन एक भाग, कालीमिर्च व सेंधा नमक आधा आधा भाग गरम जल के साथ सेवन करें।

  • 3 ग्राम अजवायन अधा ग्राम काला नमक मिलाकर फंकी लेने से पेट का अफरा दूर हो जाता है । इस चूर्ण की दो बार फंकी लेने से वायु गोल का नाश हो जाता है ।

  • अजवायन, हरड, सौंठ, सेंधा नमक की बराबर मात्रा के चूर्ण की 2 ग्राम मात्रा को गरम पानी के साथ सेवन करने से पेट दर्द ठीक हो जाता है ।

  • छोटे बच्चे के पेट में दर्द हो तो बारीक साफ़ कपड़े में अजवायन को रख शिशु को चाटते है, इससे बच्चे का पेट दर्द ठीक हो जाता है ।

  • अजवाईन की 2 ग्राम की फंकी लेने से पेट के कीड़े मरते हैं, पाचन होता है व भूख खुल कर लगती है एवम् प्रसूता स्त्रियों को प्रसूत रोग से बचाव होता है ।



2. पेट फूलने, गैस व दर्द संबंधित उदर विकार में अजवाइन के प्रयोग :




  • दस ग्राम अजवायन व छोटी हरड़ 6 ग्राम, सेंधा नमक 3 ग्राम, घी में भूनी हींग 3 ग्राम मिक्स कर चूर्ण बना लें, इस चूर्ण की 2 ग्राम मात्रा हल्के गरम जल के साथ सेवन करें ।

  • पेट में वायु गैस बनने पर 125 ग्राम दही के मठे में 2 ग्राम अजवायन तथा आधा गरम काला नमक मिलाकर भोजन के बाद आवश्यकता अनुसार लें ।

  • अजवायन का चूर्ण सुबह शाम गरम जल से सेवन करने से आराम मिलता है ।

  • डेढ़ लीटर पानी को उबालें, जब उबालकर सवा लीटर रह जाए तो उतर लें, इसमें आधा किलो अजवाईन डालकर ढक्कन बंद करदे । जा यह ठंडा हो जाए तो छानकर बोतल में भरकर रखें, इसका 50 -50 ग्राम दिन में तीन बार सेवन करने से  अफ़ारे व गैस संबंधित उदर विकार ठीक हो जाते हैं ।

  • एक किलो अजवाइन में एक किलो नींबू का रस व 50-50 ग्राम पांचों नमक मिलाकर कांच के बरतन में भर कर रख दें । जब यह सुख जाए तो इसकी 2 से 4 ग्राम की मात्रा दिन में दो बार सेवन करने से उदर संबंधी विकार दूर हो जाते हैं ।



3. पेट के कीड़े खत्म करने में अजवाईन के प्रयोग




  • 2 ग्राम अजवायन के चूर्ण में बराबर मात्रा में नमक मिलाकर प्रातः कल सेवन करने से कृमि जन्य रोग, संवत व अजीर्ण रोग ठीक हो जाते हैं।

  • अजवायन के महीन चूर्ण की 3 ग्राम मात्रा को दिन में दो बार छाछ के साथ सेवन करने से पेट के कीड़े का समूल नाश हो जाता है ।

  • अजवाइन के 500 मिली ग्राम चूर्ण में बराबर मात्रा में काला नमक मिलाकर रात को रोज ग्राम जल के साथ देने से बच्चों के कृमि रोग दूर हो जाते है ।

Ajwain
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4. खांसी में अजवाईन के प्रयोग



  • अजवाईन के चूर्ण की 2 से 3 ग्राम मात्रा को गर्म पानी या गरम धुद के साथ दिन में दो बार सेवन करने से जुकाम, नजला, सिरदर्द, खांसी में फायदा होता है ।

  • अजवाईन की दो ग्राम मात्रा छोटी पीपली आधा ग्राम, का क्वाथ बनाकर 2 से 3 ग्राम सेवन करने से खांसी व कफ ज्वर में फायदा होता है ।

  • बार बार खांसी आती हो व कफ अधिक गिरता हो तो ajwain का सत 125 ग्राम, शहद 5 ग्राम व घी 2 ग्राम मिलाकर दिन में 3 बार  सेवन करने से फायदा होता है ।

  • इसकी 5 ग्राम को 250 ग्राम पानी में पकाएं, जब आधा बाकी रह जाए तो इसे छान कर आवश्यकता अनुसार नमक मिला कर रात को सोते समय सेवन करें ।

  • खांसी पुरानी हो गई हो, व पीला कफ निकलता हो, पाचन क्रिया धीमी हो, तो इसका अर्क  25 मिलीग्राम दी में तीन बार पिलाने से लाभ होता है ।




5. जलोदर के उपचार में अजवाइन के गुण



  • इस रोग में पेट में नाभि के नीचे के हिस्से में पानी भर जाता है व पेट फूल जाता है । इसके लिए  Ajwain  को बारीक पीस कर इसमें थोड़ी मात्रा में हींग मिलाकर लेप बनाकर पेट में लगाने से जलोदर व पेट के अफारे में फायदा होता है ।

  • अजवाईन को पानी के साथ लेने से पेट में गुड़गुड़ाहट व खट्टी डकारें आना बंद हो जाती हैं  ।



6. बहुमूत्र में अजवायन के प्रयोग व फायदे



  • 2 ग्राम अजवायन को संभाग गुड के साथ कूट कर इसकी छोटी छोटी गोलियां बनाकर इसकी एक एक गोली दिन में तीन बार देने से बहूमुत्र की समस्या खत्म हो जाती है ।

  • जो बच्चे बिस्तर में पेशाब करते हैं उन्हें रात को सोते समय थोड़ी मात्रा में इसको खिलाने से यह समस्या दूर हो जाती है ।



विशेष



ऊपर बताए रोगी के अलावा अजवायन से सर्दी, जुकाम, उल्टी, दस्त, हिजा, अतिसार, मूत्र में रुकावट, प्रमेह आदि रोगी का उपचार भी किया जाता है । अजवाईन शराब छुड़वाने में बहुत ही कारगर है । जब शराब पीने की इच्छा हो और न रहा जा रहा हो तो इसकी 10 -10 ग्राम की मात्रा दो तीन बार चबाने को दें । या फिर आधा किलो अजवाईन को 400 ग्राम पानी में उबालें जब अधे से कम रह जाए तो इसे छान कर कांच की बोतल में भर के फ्रिज में रखे,  इस काढ़े की आधा कप मात्रा शराबी को पिलाएं ।

जो व्यक्ति शराब छोड़ना चाहते हैं लेकिन छोड़ नी पाते उनके लिए यह नुस्खा बहुत फायदेमंद है । यहां हमने आप को अजवाइन के उदर विकारों में प्रयोग व 6 महत्वपूर्ण फायदे एवम् गुण के बारे में अवगत कराया, आशा करता हूं कि आपको यह लेख पसंद आया होगा ।     

धन्यवाद







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Tuesday, 11 December 2018

गाजर एवम् गाजर जूस के स्वस्थ लाभ ( Benefit of carrot in Hindi)

गाजर का परिचय 


इस लेख में गाजर एवम् गाजर जूस के स्वस्थ लाभ के बारे में बता रहें हैं । गाजर का उपयोग सब्जी के अलावा अनेक व्यंजन बनाने में  किया जाता है । जैसे:- गाजर का मुरब्बा,  गाजर का आचार, गाजर का हलवा, गाजर का जूस, गाजर का सलाद आदि, गाजर लाल, पीली, अनेक प्रकार की होती है । गाजर स्वस्थ के लिए बहुत लाभ दायक है । ये आंखो कि रोशनी के लिए अति उत्तम है । गाजर में विटामिन ए तथा बिटा कैरोटीन अधिक मात्रा में पाया जाता है । इस लिए यह आंखो की रोशनी को बचाए रखता है व रतौंधी रोग को कम करता है । गाजर का वैज्ञानिक नाम Daucus carota L. है । यह Apiaccae कुल का पौधा  है । अंग्रेजी में इसे carrot के नाम से जाना जाता है ।

Gajar
गाजर

छेत्र  के अनुसार इसे अलग अलग नाम से जाना जाता है । जैसे :-

हिंदी       - गाजर

संस्कृत    - गार्जर

गुजराती  - गाजर, शर

पाजाबी  - गाजर

अरबी    - जयजर

तेलगु    - गज्जर

मराठी   - गाजर

फारसी  - जरदक



गाजर के रासायनिक सघटन :




गाजर में कार्बोहाइड्रेट्स, वसा, प्रोटीन, खनिज पदार्थ, कलीशयम फास्फोरस, लोहा, आदि तत्व पाए जाते हैं । गाजर में विटामिन A प्रमुखता से पाया जाता है, इसके अलावा इसमें विटामिन B तथा C भी पाए जाते है । गाजर में  राइबोफ्लेविन, निकोटिनिक एसिड व थायमीन पाए जाते हैं । गाजर के बीज में तेल भी पाया जाता है, जो कि उड़ जाता है ।

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गाजर के गुण एवम् स्वास्थ लाभ ( Gajar ke fayde )



  • गाजर तीक्ष्ण, मीठी, गरम, अग्निदीपन करने वाली होती है ।

  • गाजर रक्त पित्त, बवासीर नाशक होती है ।

  • गाजर कफ तथा वात नाशक होती है

  • गाजर रूचिकारक व कभी कभी थोड़ी चरपरी होती है ।

  • गाजर अफारा दूर करती है व पेट दर्द में फायदेमंद होती है ।

  • गाजर के बीज पॉस्टिक होते हैं व स्नायु मंडल के लिए लाभ दायक हैं ।

  • गाजर हृदय रोग, अतिसार, मासिक धर्म, व आंखों के लिए लाभ करी है ।

गाजर
Gajar



गाजर के स्वास्थ लाभ:



1. हृदय रोग में गाजर के स्वास्थ लाभ:



  • गाजर की 300 ग्राम मात्रा को छील कर रात भर के लिए बाहर ओस में रख दें, सुबह इस पर गुलाब या केवड़ा का अर्क छिड़क कर इसमें मिश्री मिलाकर खाने से दिल की धड़कन समान्य हो जाती है व रोगी समान्य महसूस करने लगत है ।

  • गाजर को कस कर ढूंढ में उबालकर खीर बनाकर खाने से हृदय को ताकत मिलती है व इससे खून की कमी भी पूरी हो जाती है ।

  • 20 से 30 ग्राम गाजर का मुरब्बा प्रति दिन खाने से दिल को मजबूती मिलती है, व उन्माद दूर होता है । ये मुरब्बा उत्तेजक भी होता है । मुरब्बा बनाने की विधि नीचे बता रहे हैं ।




गाजर का मुरब्बा बनाने की विधि -

ताजी गाजर लेकर साफ़ करके छोटे छोटे टुकड़े कर लें, इसको शहद मिले हुए पानी में उबले, गाजर जब मुलायम हो जाए तो इसे किसी कपड़े पर फैला कर खुश्क होने दें, जब खुश्क हो जाए तो शहद में उबले और तब तक उबालें जब एक तार की चाशनी बन जाये तो 1 से 2 ग्राम दालचीनी, इलायची, केसर, जयफल व सौंठ डाल दें । इसे कांच के कर में बंद करके 40 दिन के लिए रख दे, फिर इसका सेवन करें ।


2. आंखों के लिए गाजर के रस फायदे:




सौंफ 250 ग्राम एक कांच के बर्तन में रखें, फिर इसमें गाजर के रस की 3 बार बावना दें, जब सौंफ सुख जाए तो सौंफ की 10 ग्राम मात्रा रात को सोते समय दूध के साथ देने से आंखों की रोशनी बढ़ जाती है ।


3. मासिक धर्म में गाजर के स्वास्थ लाभ:




गाजर के छोटे छोटे टुकड़े करके पानी में उबालें, जा पानी एक चौथाई रह जाए तो इसे छान लें, इस क्वाथ की की 100 से 150 मिली ली. मात्रा सुबह शाम पीने से मासिक धर्म ठीक से होने लगता है, और कष्ट भी दूर हो जाता है ।


Gajar ke beej
Gajar ke beej



4. गाजर के जूस केंसर रोग को बढ़ने से रोकता है




गाजर के जूस के अंदर कैंसर रोग से लडने की छमता होती है। गाजर में एंटी ऑक्सिडेंट पाए जाते है व इसमें ऐसे तत्व होते है, जो व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक छमता को बढ़ाता है, व रोगों से दूर रखता है । गाजर का जूस केंसर के रोगी को फायदा तो करता ही है । बाकी स्वास्थ आदमी के लिए भी फायदेमंद है, इस लिए रोज एक ग्लास गाजर का जूस पीना चाहिए । गाजर के अनेक स्वास्थ लाभ हैं । इससे व्यक्ति तंदुरुस्त होता है व जवान बना रहता है ।

यह भी पढ़े : अरंडी तथा अरंडी के तेल के 7 उपयोग



5. गाजर ब्ल्डप्रेशर को नियंत्रित करता है




गाजर ब्लडप्रेशर व दिल के रोगियों के लिए बहू उपयोगी है । गाजर में केरोटीन की मात्रा होने के कारण ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखता है  व हार्ट अटैक के खतरे से बचाता है । गाजर में अच्छी मात्रा में पोटेशियम होने के कारण ये धमनियों को लचीला बनाता है, जिससे रक्त संचार अच्छा होता है जिससे ब्लडप्रेशर नियंत्रित रहता है।



विशेष :




गाजर की सब्जी बहुत ही लाभकारी  है, अनेक रोगी में इसका उपयोग किया जाता है । ऊपर बताए नुस्खों के अलावा गाजर की सब्जी खाने से सूजन से पीड़ित व्यक्ति को आराम मिलता है तथा गाजर का आचार खाने से लीवर वृद्धि व प्लीहा वृद्धि में फायदा करता है । गाजर के मुरब्बा से व्यक्ति पुस्ट होता है । प्रसव के कष्ट को कम करने के लिए गाजर के बीज व गाजर के पत्तों का काढ़ा बनाकर पिलाने से फायदा होता है । गाजर के अनेक स्वास्थ लाभ होते हैं, इसका सेवन करते रहना चाहिए । आशा करता हूं आप को यह लेख पसंद आया होगा । पसंद आए तो शेयर अवश्य करें ।



धन्यवाद







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Friday, 30 November 2018

गूलर के पेड़ का महत्व रक्तपित्त, खूनी डायरिया में ( Importance of gular )

परिचय

इस लेख में गूलर के पेड़ का रक्तपित्त, खूनी डायरिया, में महत्व - Importance of  gular, gular का उपयोग बहुत ही लाभकारी होता है, आर्युवेद के अनुसार gular सभी पुष्टिदायक द्रव्यो में से एक है । अंग्रेजी में इसे cluster fig अथवा country fig के नाम से जाना जाता है । इंडिया में इसे गूलर, उम्बर, ऊबरो, डिमरी, आति, आदि नामों से जाना जाता है । हेमदुग्धक, जंतु फल व सदा फल आदि नामों से भी प्रसिद्ध है ।  कुछ लोग इसे अंजीर भी बोलते हैं, गूलर के पेड़ को किसी भी स्थान से काटने पर दूध निकलता है इस लिए इसे हेमदुग्धक कहा जाता है, तथा कीट होने के कारण जनतुफल कहते हैं । गूलर के पेड़ का महत्व आर्युवेद में बहुत है ।

Gular ka ped
गूलर का पेड़

आर्युवेद में इसे पुष्टिदायक माना गया है । कहते हैं, अगर गूलर के चूर्ण व विदारीकन्द के मिश्रण को घी मिले दूध के साथ सेवन करने से बूढ़ा व्यक्ति भी जवान जैसा हो जाता है । गूलर के पेड़ के फल 1 से 2 इंच व्यास के गोलाकार होते हैं । गूलर के फल गुच्छों में बिना पत्ती की शाखाओं पर लगते हैं, यह फल जब कच्चे होते हैं, तब हरे व पकी अवस्था में लाल रंग के हो जाते हैं । Gular ke ped men में  tanin, मोम, रबड़,  तथा भस्म में फास्फोरिक एसिड व सिलिका आदि पाए जाते हैं ।
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गूलर के गुण फायदे ( benefit of gular ped)



गूलर के पेड़ की छाल व कच्चे फल इस्थंबन, व अग्नि सादक होते हैं । गूलर प्रमेह नाशक, पितनशक, जलन को शांत करता है । यह शीतल व रक्त संग्रहिक होता है । गूलर के पेड़ का महत्व प्रमेह में बहुत अधिक है । गूलर से खूनी पित्त, खूनी पेचिस, नाक से खून आना, पेशाब में खून आना, मसिकधर्म आदि खूनी रोगों का इलाज विशेष रूप से किया जाता है और लाभ होता है ।


गूलर के पेड़ का उपयोग व औषधीय प्रयोग(importance of gular tree)



1. रक्तपित्त, रक्तप्रमेह रक्त अतिसार में गूलर के महत्व



  • गूलर के पेड़ के सूखे हुए कच्चे फलों का चूर्ण बनाकर इसमें बराबर मात्रा में मिश्री मिला लें, इस मिश्रण के 5 से 10 ग्राम तक की मात्रा ताजे पानी के साथ 21 दिन तक सुबह शाम पीने से रक्त प्रमेह, रक्त अतिसार, अत्यधिक रक्तस्राव, रक्तपित्त में पूरी तरह फायदा करता है ।


  • पांच ग्राम सूखे हुए हरे फल को पानी के साथ पीस कर मिश्री मिलाकर पिलाने से भी रोगी को लाभ मिल जाता है ।


  • शरीर के किसी भी भाग से खून बहता हो और सूजन हो  इस तरह के रोग के लिए गूलर बहुत ही उत्तम दवा है। नाक से खून बहता हो, मासिक धर्म अधिक होता हो, पेशाब में खून आता हो  ऐसे रोग में गूलर के पेड़ 2 से 3 पके फलों को शक्कर के साथ सुबह दोपहर शाम देने से  जल्दी ही आराम हो जाता है ।


  • गूलर के पेड़ की छाल की 20 से 30 ग्राम मट्रा को पानी में पीस कर तलू में लगने से नकसीर का होना बंद हो जाता है ।


  • गूलर के पेड़ के  पत्ते के पांच ग्राम मात्रा का रस निकाल कर शहद के साथ मिला कर देने से रक्त पित्त ठीक हो जाता है । इस प्रयोग से रक्त अतिसार में भी फायदा होता है ।


  • गूलर पेड़ की जड़ ताजी की 30 ग्राम मात्रा को कूट कर इसका क्वाथ बनाकर 3 महीने तक नियमित रूप से सुबह शाम पीने से गर्भपात नहीं होता है । गूलर की जड़ की जगह  5 से 10 ग्राम गूलर की जड़ की छाल का भी प्रयोग कर सकत हैं ।


  • गूलर पेड़ के फल 5 ग्राम चूर्ण को कमल गट्टे को दूध के साथ दिन में तीन बार पिलाने से रुधिर वमन ( खूनी उल्टी) होना बंद हो जाती है । 


2. अतिसार में गूलर के पेड़ का महत्व



  • अतिसार के लिए गूलर के पत्ते का चूर्ण 3 ग्राम व 2 नग कालीमिर्च, थोड़े से चावल के धोवन के सठबरीक पीस कर इसमें कला नमक व छाछ मिलाकर , छान कर सुबह शाम सेवन करने से फायदा होता है ।


  • आंव तथा अतिसार में गूलर के पेड़ की जड़ के चूर्ण की 3 से 5 ग्राम मात्रा को ताजे पाने के साथ फंकी लेने से लाभ होता  है ।


  • गूलर के पेड़ के दूध की 4 से 5 बूंद बताशे में डाल कर खाने से अतिसार मिटा है । गूलर के फल खाने से पेट दर्द में आराम मिलता है ।


3. प्रमेह में गूलर का महत्व



  • गूलर के फल के सूखे छिलके बीज रहित लेकर पीस लें, इसमें बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर इसकी 6 ग्राम मात्रा सुबह शाम गए के दूध के साथ सेवन करने से पित्त प्रमेह में लाभ होता है।


  • पुए प्रमेह में gular के कच्छे फलों का महीने चूर्ण में बराबर मात्रा में खांड मिलाकर 5 से 6 ग्राम की मात्रा लस्सी के साथ सेवन करने से लाभ होता है ।
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4. बजीकरण में लाभदायक है गूलर के फल



गूलर के फल तथा बिद्री के कांड का चूर्ण बराबर मात्रा में लेकर इसमें 4 से 6 ग्राम मिश्री मिला कर, घी मिले दूध के साथ सेवन करने से पुरुष शक्ति में वृद्धि होती है । इसे स्त्रियां भी प्रयोग कर सकती हैं, इससे समस्त स्त्री रोग दूर हो जाते हैं।


Gular ke fall tatha patte
गूलर फल


5. गूलर पेड़ का महत्व व अन्य फायदे



#  पित्त ज्वर व दाह में गूलर की गोंद व 3 ग्राम शक्कर को मिलाकर फंकी लेने से लाभ होता है ।


#  गूलर के पत्तों को पीस कर शहद के साथ मिलाकर चाटने से पित्त विकार में आराम मिलता है ।


#  गूलर पेड़ की ताजी जड़ के 5 से 10 ग्राम रस में शक्कर मिलाकर सुबह शाम देने से तृष्णा युक्त ज्वर या पित्त ज्वर उतर जाता है।


#  गूलर के रस की 5 से 10 मिली मात्रा  में मिश्री मिला कर सुबह शाम पीने से श्वेत प्रदर में लाभ मिलता है ।


#  अर्श में फायदा करते हैं गूलर पेड़ के पत्ते, इसके कोमल पत्ते 10 से 15 ग्राम को बारीक पीस कर, एक पाव गाय के दूध की दही में सेंध नमक मिलाकर, के साथ सुबह शाम सेवन करने से बवासीर में लाभ होता है ।


विशेष



गूलर का प्रयोग बहत से रोगों में किया जाता है, गूलर के पेड़ का महत्व बहुत है हमारे देश में । कुछ लोग इसे अंजीर के नाम से पुकारते हैं, इसके फल में कीट  पाए जाते हैं, फल को तोड़ने से कीट उड़ जाते हैं । फिर भी इसे सफाई से खाना चाहिए । इसका प्रयोग सीमित मात्रा में ही करना चाहिए । कभी कभी इसकी अधिक मात्रा नुकसान दायक होती है, इस लेख में हमने गूलर के पेड़ के महत्व के बारे में आपको बताया है । आशा करता हूं आपको यह लेख पसंद आया होगा ।

धन्यवाद ।



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Thursday, 22 November 2018

तेजपत्ता के 7 खास फायदे व नुस्खे ( bayleaf in Hindi)

Tejpatta tree
Tejpatta plant

परिचय


तेजपत्ता के 7 फायदे व  नुस्खे (bayleaf in Hindi ),  tejpatta (bayleaf)  के पेड़ पहाड़ के जंगलों में पाए जाते  हैं। तमाल पत्र के पेड़ के पत्ते सूखा कर तेजपात के नाम से बेचे जाते हैं । tejpatta की पत्तियों का रंग हरा होता है, जो सुख कर धूसर हो जाता है । इसमें एक मनोरम गंध पाई जाती है । तेजपत्ता का उपयोग मसाले के रूप में तो किया ही जाता है साथ ही यह बहुत से रोगों के काम आता है । तेजपत्ते का प्रयोग ज्यादातर भारतीय पकवानों में किया जाता है, तेजपत्ता को इंग्लिश में Indian cinnamon तथा bayleaf के नाम से जाना जाता है, तेजपत्ता को भाषाओं के अनुसार तमालपत्र, tejpaat, तेजपत्ता, लमालपत्र, आदि नामों से जाना जाता है ।

मसाले के तौर पर इस्तेमाल होने वाली तेजपत्ता की पत्त‍ियों में कई औषधीय गुण पाए जाते हैं. तेजपत्ता की पत्तियों से तेल भी निकाला जाता है, तेजपत्ते में अच्छी मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट पाया जाता है । इसके अलावा तेजपत्ते में कई तरह के प्रमुख लवण जैसे कॉपर, पोटैशियम, कैल्शियम, मैंगनीज, सेलेनियम और आयरन आदि पाया जाता है, तेजपात के पेड़ की छाल का प्रयोग दालचीनी के रूप में किजा जाता है, यह भी मसलों व अन्य कामों में प्रयोग की जाती है ।

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1. जुकाम, खांसी, सर्दी में फायदा करता है तेजपत्ता (bayleaf in Hindi )



  • तेजपत्ता की छाल 5 ग्राम और छोटी पीपली 5 ग्राम लेकर दोनों को पीस ले, इसमें दो चम्मच शहद मिलाकर चाटने से खांसी व जुकाम ठीक होता है ।


  • छींक आती हो, सिरदर्द हो, नाक बहता हो तो चाय पत्ती की जगह तेजपत्ते की चाय पीने से आराम मिलता है, ताजपत्ते को सूंघना भी फायदेमंद होता है ।


  • तेज पात का चूर्ण एक चम्मच को एक कप दूध में डाल कर सेवन करने से खांसी में आराम मिलता है ।


2. आंख के रोग में तेजपत्ता के लाभ ( benefit of tejpatta )



तेजपत्ते को पीस कर आंख में लगने से आंख का जाला व धुंध मिटती है । नखुना रोग भी इसका प्रयोग करने से ठीक हो जाता है ।


3. सिरदर्द में तेजपत्ता के उपयोग ( uses of bayleaf )



100 ग्राम तेजपत्ते पानी के साथ पीस कर माथे पर लेप करने से सिरदर्द में आराम मिलता है । आराम मिलने के बाद लेप हटा ले, सिरदर्द गरमी में हो तथा सर्दी में दोनों ही प्रकार के दर्द में फायदा करता है ।



4. दांतों का मेल उतारने में उपयोगी तेजपत्ता (use of tejpatta in teeth)




  • तेजपत्ते का बारीक चूर्ण बनाकर सुबह शाम दांतों पर मंजन करने से दांतों में चमक आ जाती है ।


  • तेज पत्ते के डंठल से दांतों में दोनों टाइम दातुन करने से दांतों में खून आना रुक जाता है व दांत स्वस्थ हो जाते हैं ।


5. गर्भाशय शुद्धि में सहायक है तेजपत्ता




  • Tejpatta का 40 से 50 ग्राम काढ़ा प्रसूता को पिलाने से दूषित मल्ल व रक्त बाहर होकर गर्भाशय शुद्ध होता है ।


  • तेजपत्ता का 1 से 3 ग्राम चूर्ण का सुबह शाम सेवन करने से गाभश्ये शुद्ध हो जाता है ।


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6. श्वास व दमा में तेजपत्ता के लाभ ( benefit of tejpatta )




  • तेजपत्ता चूर्ण की एक चम्मच मात्रा को एक कप गरम दूध के साथ सेवन करने से दमा तथा श्वास रोग में लाभ मिलता है ।


  • पीपल व तेजपत्ता की दो दो ग्राम मात्रा को कूट कर अदरक के मुरब्बे की चासनी में डाल कर चाटने से दमा व श्वास नली के साइड इफेक्ट खत्म हो जाते हैं ।


Tejpatta
तेजपत्ता के पत्ते



7. तेजपत्ता के अन्य प्रयोग




1. तेजपत्ता के पत्ते को नियमित रूप से चूसने से हकलाहट में लाभ होता है ।

2. तेजपत्ता की छाल का चूर्ण बारीक कर फांकने से वायु गोला मिटता है ।

3. तेजपत्ता का काढ़ा पीने से पेट फूलने, दस्त लगना आंतों की खराबी आदि बीमारी  ठीक हो जाता है ।

4. तेजपत्ता के पत्ते का लेप बनाकर जोड़ो पर लगाने से संधि वात में लाभ मिलता है ।

5. तेज पत्ता के चूर्ण की फंकी लगने से उबकाई रुक जाती है।

6. तेजपत्ता का चूर्ण, एक कप पानी के साथ सेवन करने से शरीर में किसी भी तरह का हो रहा रक्तस्राव रुक जाता है ।

7. तेजपत्ता को नियमित रूप से कुछ दिन चबाने से पीलिया व पथरी की तीव्रता कम होकर आराम मिलजता है।

8. तेज पात का रायता बनाकर सुबह शाम खाने से अरुचि का रोग ठीक हो जाता है ।

9. तेजपत्ता का तेल, दर्द निवारक का भी कम करता है, इसको वेदना वाले स्थान पर लगाने से दर्द में राहत मिलती है ।

10. रात को बिस्तर पर जाने से  पहले तेजपत्ते का प्रयोग करना अच्छी नींद आने के लिए बहुत उपयोगी है. तेजपत्ते के तेल की दो तीन बूंदों को पानी में मिलाकर पीने से नींद बहुत अच्छी आती है ।


विशेष



इस लेख में तेजपत्ता के गुण व फायदों व तेजपत्ता के हानियों tej patta health benefit के बारे में वर्णन किया गया है। तेजपत्ता गुर्दे व गुर्दे की पथरी के लिए बहुत फायदेमंद है । इसके लिए तेजपत्ता को उबालकर इसका पानी ठंडा करके पीने से गुर्दे की पथरी व गुर्दे के रोग में फायदा होता है । इस लेख का मूल उद्देश्य जनमानस को आर्युवेद के प्रति जागरूक करना है, दवा के रूप में bayleaf प्रयोग इसके निश्चित अनुपात में ही करे । अधिक गंभीर रोग में तेजपत्ता उपयोग किसी वैद्य की सलाह पर ही करे । आशा करता हूं कि आपको यह लेख पसंद आया होगा ।





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Monday, 12 November 2018

अलसी के फायदे एवम् औषधीय गुण (Benefit of flaxseed in Hindi)

Alsi ke beej
Alsi ke beej


अलसी का परिचय



अलसी के फायदे एवम् औषधीय गुण, अलसी का प्रयोग अनेक रोगों के उपचार में किया जाता है, हमारे देश में इसे अलसी, तीसी, नीलपुष्पी, अट्सी व जवसू आदि नामों से जाना जाता है । Alsi को इंग्लिश में Linseed, flaxseed कहा जाता है। स्थान भेद के कारण इसके रंग व आकार में तीसी के बीजों में अन्तर पाया जाता है। तीसी के बीज सफेद, पीले, लाल कई तरह के होते हैं । Alsi ke beej से तेल व इसके डंठल से फाइबर बनता है। यह फाइबर कपड़ा बुनने के काम आता है । अलसी का पौधा 2 से 4 फुट ऊंचा होता है। अलसी के पौधे में सर्दियों में फूल व फल आते है, फरवरी - मार्च में फल पूरी तरह सूख जाते हैं ।

तीसी के बीजों में एक स्थिर तेल होता है, जिसमें लिनोलिक तथा लिरोलेनिक के ग्लिसराइड होते है । अलसी के बीजों में  जहरीला ग्लूकोसाइड पाया जाता है । इसके अलावा अलसी के बीजों में प्रोटीन, म्यूसिलेज, रालिए पदार्थ तथा फास्फेट व शर्करा के अंश पाए जाते हैं । अलसी औषधीय गुण से भरपूर है ।



अलसी के गुण व फायदे:



अलसी के बीज उष्ण, सनिग्ध, मधुर, मंद गंधयुक्त, चरपरी, व बलकारक, शोथहर, और थोड़ी मात्रा में मूत्रकारक होते है । तीसी वातनशक होती है। अलसी का तेल मधुर, वतनाशक, मलकराक, भारी व गरम होता है। अलसी के पत्ते के खांसी, श्वास, कफ वातनाशक होता है, इसके ताजे हरे पत्ते से सब्जी बनती है, जो वातग्रस्थ रोगियों के लिए विशेष उपयोगी है। अलसी के फूल रक्त पित्तनाशक होते हैं ।


अलसी के उपयोग:



1. अलसी के फायदे, खांसी व श्वास के रोग में:



  • अलसी के बीज 3 ग्राम लेकर 250 ग्राम तुरंत उबले पानी में डुबोकर एक घंटे के लिए रख दें । इसके बाद छान कर थोड़ी शक्कर मिला कर पीने से खांसी ढीली हो जाती है व सांस की घबराहट काम हो जती है ।


  • अलसी के बीज 5 ग्राम को कूट कर छानकर जल में उबालें । फिर इसमें 20 ग्राम मिश्री मिलाकर सुबह शाम सेवन करे। सर्दियों में मिश्री की जगह शहद का प्रयोग करें ।


  • अलसी के बीज को भून लें, फिर इसमें शहद मिलाकर चाटने से खांसी व श्वास रोग में फायदा होता है ।


  • अलसी के बीज 5 ग्राम लेकर इसे 50 ग्राम पानी में भिगोकर रख दें, लगभग 12 घंटे बाद इस पानी को पी लेवें । सुबह भिगोया हुआ शाम को सेवन करें व शाम को भिगोया हुआ सुबह सेवन करें। इस प्रयोग से श्वास के रोगी में लाभ होता है।


  • अलसी को मंद आग पर भून कर पीस कर इसमें अलसी की बराबर मात्रा में मिश्री मिला लें, इसकी 5 - 5 ग्राम मात्रा सुबह शाम गुनगुने जल के साथ सेवन करने से जुकाम में फायदा हो जाता है ।



2. अलसी के फायदे मूत्र विकार में :




  • 10 ग्राम अलसी व 6 ग्राम मुलेठी को कूट कर इसमें एक ली. पानी मिला कर उबालें, जब यह अठवा हिस्सा बाकी राह जाए तो इसकी 25 ग्राम मात्रा में 10 ग्राम मिश्री मिलाकर 3 घंटे के अंतराल पर देने से जलन दूर होकर मूत्र साफ़ होने लगता है ।


  • अलसी व मुलेठी बराबर मात्रा में लेकर कूट लें, इस मिश्रण को 40 से 50 ग्राम मात्रा को मिट्टी के बर्तन में डालकर इसमें 1 ली. पानी डाल कर ढककर रखें । एक घंटे बाद छान कर इसमें 25 ग्राम कल्मीशोरा मिलाकर बोतल में रख दें ।  इस जल की  25 से 30 मिलीग्राम मात्रा का सेवन करने से पेशाब रुक कर आना व पेशाब में जलन होना व पेशाब के अन्य रोग ठीक होते हैं ।


3. अलसी का फायदा आग से जले में :



अलसी का तेल व चूने का निथरा जल बराबर मात्रा में लेकर अच्छी तरह घोट लें , घोटने से यह सफेद मलहम जैसा हो जाता है । इसे carron oil के नाम से जाना जाता है । इसको आग से जले स्थान पर दिन में दो बार कुछ दिन लगाने से घाव की पीड़ा दूर होकर ठीक हो जाता है ।




4. अलसी के बीज का फोड़ा - फुंसी में उपयोग :




  • अलसी को पानी में पीस कर इसमें जौं का सत्तू मिलाकर खट्टी दही के साथ मिलाकर फॉड पर लेप करने से फोड़ा पक जाता है ।


  • फोड़े में जलन व दर्द हो तो अलसी व तिल को भून कर गाय के दूध के साथ उबाल कर ठंडा हो जाने के बाद फिर इसी दूध में पीस कर फोड़े पर लेप करने से फायदा होता है ।



5. वात व कफ संबंधित रोग में अलसी का फायदा:



50 ग्राम अलसी को तवे पर भून कर इसका चूर्ण बनाकर इसमें 50 ग्राम मिश्री व 10 ग्राम मिर्च का चूर्ण मिलाकर फिर शहद के साथ घोटकर 3 से 6 ग्राम की गोलियां बना लें । बच्चो को इसकी 3 ग्राम की मात्रा तथा बड़ों को इसकी 6 ग्राम की गोली प्रातः काल सेवन कराने से वात व कफ जन्य विकारों में लाभ मिलता है ।



अलसी का पौधा
Also ka paudha



6. सिरदर्द व निद्रा में अलसी के फायदे :




  • अरंडी व अलसी का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर कांसे के बर्तन में घोट कर आंख में सुरमे की तरह लगाने से नीद अच्छी आती है ।


  • अलसी के बीज को जल में पीस कर लेप करने से सिरदर्द व मस्तिष्क पीड़ा में फायदा होता है ।


विशेष:



अलसी का सेवन बहुत ही लाभकारी है, अलसी का सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए, अलसी की अधिक मात्रा में सेवन करने से कब्ज की शिकायत हो सकती है । जबकि इसकी उचित मात्रा में सेवन करने से पेट साफ होता है । अधिक मात्रा में अलसी के बीज का सेवन करने से एलर्जी भी हो जाती है, इस लिए अलसी का प्रयोग उचित मात्रा में ही करना चाहिए । जटिल रोग में अलसी व अलसी के तेल का प्रयोग किसी चिकित्सक के परामर्श पर करे । आशा करता हूं कि आप को यह लेख पसंद आया होगा।

           


      धन्यवाद ।



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Monday, 5 November 2018

अर्जुन के पेड़ का हृदय रोग में महत्व ( Importance of arjun tree in hindi)

अर्जुन का पेड़
Arjun tree

परिचय 



अर्जुन का उपयोग पुराने समय से हृदय के रोगियों के लिए किया जाता है, Arjun हृदय के लिए रामबाण औषधि है, अर्जुन का पेड मुख्यता जंगलों में पाया जाता है,  Arjun Tree पहाड़ी इलाकों में अधिकता में पाए जाते है। इसके पेड़ पर गर्मियों में फूल खिलते हैं व जाडो में फल आते हैं । इसे इंग्लिश में Arjun tree के नाम से  व गुजराती में साजड़ कहा जाता है, व हिंदी में अर्जुन अथवा कहूं कहते हैं ।

Arjun ki chaal में अनेक प्रकार के रसायनिक तत्व पाए जाते है । Arjun कैल्शियम कार्बोनेट अधिक मात्रा में पाया जाता है व सोडियम, मैग्नीशियम, अल्मिनियम प्रमुख छार है, सोडियम व कैलशियम की अधिकता के कारण हृदय की मासपेशियों के लिए फायदे मंड होता है ।


अर्जुन की छाल के गुण व फायदे:




अर्जुन शीतल होता है व हृदय के लिए बहुत ही लाभकारी होता है । Arjun ki chhal रुधिर विकारों, पित्त, कफ, विष, प्रमह,घाव आदि का नाश करता है । अर्जुन से हृदय की मांसपेशी मजबूत होती है व दिल को ताकत मिलती है । मासपेशियों की ताकत बढ़ने से हृदय का स्पंदन ठीक होता है, व रक्तवहनिया से रक्त स्राव कम हो जाता है और हृदय की दर्द को दूर करता है। इस तरह रक्त वाहनियो का सकोचन ठीक से होने लगता है । हृदय रक्त को पूरे शरीर में भेजने व खीचने लगता है । और व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है । अर्जुन के प्रयोग से पित्त की अमलता कम होकर रक्त में स्थिरता उत्पन्न होती है । जिससे पित्त विकारों में फायदा होता है ।



अर्जुन के औषधीय प्रयोग एवम् फायदे ( Benefit of Arjun Tree):



1. हृदय के रोग में अर्जुन के पेड़ के फायदे :



  • अर्जुन की छाल हृदय की शीतलता, सूजन, हृदय का बड जाने, आदि बहुत से हृदय रोग में लाभकारी होता है ।

  • अर्जुन हृदय की शीतलता में तथा उससे होने वाली दर्द में लाभ करता है इसके लिए अर्जुन छाल के चूर्ण की 5 से 10 ग्राम मात्रा को गुड़ व दूध के साथ पका कर रोगी को पिलाने से शोथ का बडना रुक्कर शीतलता दूर हो जाती है ।

  • हार्ट अटेक हो जाने पर अर्जुन की छाल का 40 मिली लीटर काढ़ा सुबह शाम सेवन करने से हृदय की शक्ति बढ़ती है । अर्जुन दिल के लिए टॉनिक का काम करता है, पूरे लाभ के लिए गाय के दूध में काडा बनाकर सेवन करना आवश्यक है । इस  इस छीर पाक विधि से लेने से हृदय की तेज धड़कन व पीड़ा, घबराहट खत्म हो जाती है । 



  • अर्जुन की छाल का  काडा बनाने की की विधि - अर्जुन की छाल को सूखा कर चूर्ण बनाकर रख ले । 250ग्राम दूध में 250 ग्राम पानी  मिला कर धीमी आंच पर पकाये, फिर इसमें एक चम्मच अर्जुन का चूर्ण डाल कर उबले जब पक कर आधा रह जाए तो इसे उतार लें । जब पीने लाायक हो जाएं तो छाान कर रोगी को पिलाएं । इससे सारे हृदय रोग ठीक हो जाते है। और हार्ट अटैक का खतरा नहीं रहता ।

  • अर्जुन की छाल के चूर्ण कप्पड़ छान किया हुआ का प्रभाव इंजेक्शन से भी अधिक होता है। इस चूर्ण को जीभ पर रख कर चूसते ही रोग कम हो जाता है । यह प्रयोग बहुत ही लाभकारी होता है । हृदय की धड़कन तेज हो व नाड़ी की गति धीमी हो तो इस नुस्खे को रोगी की जीभ पर रखने से ही नाडी में शक्ति पैदा हो जाती है । इस प्रयोग का फायदा स्थाई होता है ।


2. हृदय की धड़कन में अर्जुन के फायदे:



  • अर्जुन की छाल का बारीक चूर्ण  की एक चमच की मात्रा को एक कप मलाई रहित दूध के साथ नियमित रूप से सुबह शाम सेवन करने से हृदय के अनेक रोगों में लाभ मिलता है । इससे हृदय की कमजोरी दूर होती है, हृदय बलवान होता है व दिल की धड़कन ठीक हो जाती है ।

  • यदि हृदय की धड़कन बहुत बड़ जाए तो एक चम्मच अर्जुन की छल का चूर्ण को एक गिलास टमाटर के रस में मिलाकर पीने से शीघ्र ही धड़कन समान्य हो जाती है । इसका  सेवन कुछ दिन नियमित रूप से करना है।

  • गेहूं का आटा 20 ग्राम ले कर इसको 30 ग्राम गाय की घी में भुने जब यह गुलाबी हो जाए तो इसमें 3 ग्राम अर्जुन की छल का चूर्ण व मिश्री 40 ग्राम तथा 100 ग्राम पानी डाल कर पकाएं जब हलुआ तैर हो जाए तो इसका सेवन नित्य सुबह करे । इसका सेवन करने से धड़कन, घबराहट, व हृदय की पीड़ा में आराम मिल जाता है ।

  • Arjun ki Chaal के चूर्ण से बना हलुआ उच्च रक्तचाप में भी फायदेमंद है । उच्च रक्तचाप के कारण हृदय में जो सूजन हो जाती है उसको दूर करता है ।


अर्जुन के पेड़ की छाल के अन्य फायदे:


Arjun ki chal
Arjun ki chhal

1. मुहपाक में अर्जुन का लाभ:




मुंह पक गया हो तो अर्जुन की जड़ का चूर्ण में मीठा तेल मिला कर कुल्ला करने से मुखपाक ठीक हो जाता है


2. कान दर्द में अर्जुन के फायदे:




अर्जुन के पत्ते के रस को कान में डालने से कान के दर्द में आराम मिल जाता है ।


3. बादी के रोग में फायदा करता है अर्जुन :




अर्जुन के जड़ की छाल व गंगेरण की जड़ की छाल के चूर्ण की दो - दो ग्राम मात्रा को मिला कर सुबह शाम फंकी मारने से व ऊपर से दूध लेने से बादी कि समस्या दूर हो जाती है ।



4. रक्त अतिसार में अर्जुन की छाल का चूर्ण:



अर्जुन की छाल का 5 ग्राम चूर्ण को 250 ग्राम गाय के दूध में डाल कर इसमें 250 मिली ली. पानी मिलाए, और इसे हलकी आग पर पकाएं, जब पक कर आधा रह जाए तो इसे उतार ले, जब यह गुनगुना हो जाए तो इसमें 10 ग्राम मिश्री अथवा शक्कर मिलाकर रोगी को नित्य सुबह पिलाने से रक्त पित्त व रक्त अतिसार में लाभ करता है, इस नुस्खे से हृदय रोग में भी फायदा होता है ।


5. चोट में फायदा करता है अर्जुन:



अर्जुन के जड़ के कारण की एक चम्मच फंकी दूध के साथ लेने से चोट व रगड़ लगने के कारण नील पड़ जाता है में लाभ मिल जाता है ।


विशेष:



Arjun तथा अर्जुन की छाल उच्च रक्तचाप व हृदय रोग में अत्यंत लाभकारी है , यह हार्ट अटैक व दिल की धड़कन में बहुत ही उपयोगी है । ऊपर बताए फायदे के आलावा यह जीर्ण ज्वर, मूत्र के रोग, व कुष्ठ रोगी में भी लाभकारी है । अर्जुन के उपयोग को देखते हुए अर्जुन के पेड़ के महत्व को समझा जा सकता है । गंभीर रोग में इसका उपयोग किसी वैध की सलाह से करे।क्योंकि इस लेख लिखने का मूल उद्देश्य लोगो को आर्युवेद के प्रति जागरूक करना है । उम्मीद करता हूं आप को यह लेख पसंद आया होगा ।




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